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बुधवार, 2 सितंबर 2009
बुंदेलखंड में अभी और मौतों की प्रतीक्षा में है सरकार
आज बुन्देलखण्ड के किसानो को सीधी और त्वरित सहायता की जरूरत है। सूखा राहत के नाम पर विभिन्न योजनाओ में जमकर बन्दर बाँट होता है , इसलिए पात्र किसानों को समय से और उचित मात्रा में राहत राशिः नही पहुँच पाती है। केन्द्र सरकार से हम मांग करते हैं कि राज्य सरकारों को पैकेज न देकर जिलाधिकारियों के माध्यम से किसानों को सीधी सहायता मुहैया करायी जाए। ये पहले ही सिद्ध हो चुका है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसी राहत राशियों का जमकर दुरूपयोग किया है।लिहाजा अब पुनरावृत्ति से बचा जाना चाहिए। इसके अलावा सूखा राहत मिलने के नियम कानून इतने जटिल होते है कि आम आदमी उन्हें समझ नही पाता है , इसलिए ऐसे में वह जान ही नही पाता है कि उसे कितनी राशि मिलनी चाहिए , फलस्वरूप उसे जो भी मिलता है वह उतने से ही संतुष्टि कर लेता है। अतः राहत देने का फार्मूला आसान हो । बुन्देलखंड में सूखा पीड़ित किसानो द्वारा आत्म हत्याओं का सिलसिला शुरू हो चुका है इसलिए और मौतों का इंतजार न करते हुए सरकार को जल्द ही सहायता की सोचनी चाहिए। हालाँकि इस वर्ष पूरे भारत में ही सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है किंतु बुन्देलखंड की स्तिथि इसलिए हटकर है क्योंकि यहाँ सूखा का पहला साल नही बल्कि पिछले पॉँच वर्षों से यही हालत है। इसलिए सरकार को बुन्देलखंड के किसानो के बारे में प्राथमिकता से सोचना होगा। राहत प्रदान करते समय भी बुन्देलखंड के किसानो को देश के अन्य हिस्सों के किसानो से तुलना न करते हुए विशेष अधिभार दिया जाए ।बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी यहाँ के किसानों की समस्याओं को लेकर विशाल आन्दोलन शुरू करने जा रही है।
मंगलवार, 23 जून 2009
बुन्देलखंड में फ़िर सूखे जैसे हालात : किसानो की नींद हराम

एक बार फ़िर से बुन्देलखंड में सूखे जैसी नौबत की संभावना बन रही है। यहाँ भीषण गर्मी में आमजन, पशु सब अकुला रहे है। गर्मी के तल्ख तेवर कम होने का नाम ही नहीं ले रहे। मानसून के आने के बाद भी वर्षा न होने से किसानों के माथे में चिंता की लकीरें पड़ गई है। सभी यह सोच कर दहल जाते है कि क्या इस वर्ष भी पिछले वर्षो की भांति सूखे की भयावह स्थिति से रूबरू होना पड़ेगा। किसान अब बरखा रानी का बेसब्री से इंतजार कर रहे है।गर्मी इस वर्ष अपने पूरे शबाब पर है। जिससे धरती से जल स्तर खिसकने लगा है। लगातार चार साल से बुंदेलखंड के किसानों को सूखे की मार झेलने के बाद पिछले वर्ष हुई बारिश ने कुछ राहत तो जरूर पहुंचाई थी। मगर इस वर्ष मानसून आने के बाद भी बारिश न होने से किसानों को फिर वहीं पुराने दिन याद आने लगे है। रूठे इंद्रदेव को मनाने के लिये ग्रामीण अंचलों में धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो गये है। महोबा जिले के कुलपहाड़ के मां बाघ विराजन मंदिर में पिछले एक सप्ताह से संकीर्तन और पूजा पाठ का दौर चल रहा है। किसान को भी फसल बुवाई के लिये बरखा रानी का इंतजार है। पहले 15 जून से ही आसमान से बारिश होने लगती है। जिससे किसान अपने खेतों में खरीफ फसल की बुवाई करने लगता था। लेकिन इस वर्ष अब तक बारिश न होने से किसानों में चिंता की लकीरें स्पष्ट देखी जा सकती है। सभी मायूस हो बस इंद्रदेव की मेहरबानी का इंतजार कर रहे है। लेकिन वह यह सोचकर दहल जाते है कि क्या इस वर्ष भी पिछले चार वर्षो की भांति सूखे की भयावह स्थिति से रूबरू होना पड़ेगा। सभी किसान अब बरखा रानी का बेसब्री से इंतजार कर रहे है। बुंदेलखंड मे उद्योगों का अभाव होने के कारण यहाँ का निवासी पूरी तरह खेती पर निर्भर है इसलिए वह मौ़सम में थोडी सी अनियमितता से ही घबरा जाता है। इसीलिए यहाँ की क्षेत्रीय पार्टी यानि बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी सदैव सरकारों से मांग करती आ रही है कि बुंदेलखंड मे औद्योगिक विकास की दरकार है ताकि यहाँ का किसान कृषि का विकल्प तो पा सके.
बुधवार, 21 जनवरी 2009
लम्बी कवायद के फलस्वरूप राज्य निर्माण का कार्य सिफर
बुन्देलखंड राज्य निर्माण के प्रति दोहरा नजरिया रखने वाले दलों को महंगा साबित होगा।जहां बसपा प्रमुख पृथक बुंदेलखंड राज्य की वकालत करती है वही वे इस आशय का प्रस्ताव केंद्र को भेजने से कतराती है . इसका मतलब उनकी सोच में कोई खोट है. इसी तरह कांग्रेस भी बुन्देलखंड की बात करती हैं पर दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती.वर्षो से हो रही कवायद के फलस्वरूप राज्य निर्माण का कार्य सिफर बना हुआ है। कभी केन्द्र सरकार प्रात निर्माण की गेंद राज्य सरकार के पाले में डाल देती है तो कभी राज्य सरकार इसे किक कर पुन: केन्द्र सरकार के पाले में पहुंचा देती है। ये राजनैतिक दल बुंदेलखण्ड में फैले भ्रष्टाचार, अकाल की स्थिति पर आसू तो बहाते है, लेकिन इन समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए प्रात का निर्माण करने में पीछे हट जाते है। यही बड़ी वजह है कि बुन्देलखण्ड बड़ी कीमत चुकाने के पश्चात भी प्रात के रूप में पहचान हासिल नहीं कर पा रहा है।बुन्देलखण्ड का मसौदा वर्ष 1955 में ही तय कर लिया गया था, लेकिन तत्समय इसको अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, जिसका खामियाजा आज तक बुन्देलखंडियों को भुगतना पड़ रहा है। कई संगठन प्रात निर्माण के मुद्दे को जीवित बनाये हुए है। प्रात निर्माण के लिए बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी ने उग्र आदोलनों की शुरुआत की है ,इन आदोलनों के पश्चात तेजी से सरकारों का ध्यान बुन्देलखण्ड की बदहाली पर गया . वर्तमान समय में बुन्देलखण्ड में अनेक कार्यक्रम प्रात निर्माण की लड़ाई के लिए चलाये जा रहे है। रैलियों, आदोलनों के फलस्वरूप भी प्रात अब भी देश के नक्शे पर उभर नहीं पाया है। बुन्देलखण्ड में इतना राजस्व प्राप्त होता है जो एक प्रात के लिए जरूरी है। इसके बावजूद भी सरकारे इसे प्रात का नाम देने में सकुचा रही है। बुद्धिजीवी लोगों का मानना है कि सरकारों द्वारा बुन्देलखण्ड को प्रात नहीं बनाने के पीछे बड़े राजनैतिक दल ही है . सपा जैसे भी कई दल है जो अलग प्रात बनाने पर सीधे तौर पर न कर चुके है। उन्हे लग रहा है यदि बुन्देलखण्ड राज्य बन गया तो उनका बड़ा वोट बैंक खिसक जायेगा। बुद्धिजीवी मानते है कि भले ही बुन्देलखण्ड में अशिक्षितों की बड़ी तादाद हो लेकिन समय आने पर इस क्षेत्र के लोग ऐसे राजनैतिक दलों को सबक सिखा देंगे।आगामी लोकसभा चुनाव में यहाँ की जनता इनसे खुलकर बदला लेने के मूड में है
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संजय पाण्डेय
गुरुवार, 1 जनवरी 2009
विकसित प्रदेश बनेगा बुंदेलखंड : संजय पाण्डेय
झाँसी । बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि यदि भारत की संसद बुंदेलखंड राज्य निर्माण के लिए गंभीरता से सोचती है और बुंदेलखंड राज्य का गठन होता है तो जो बुन्देलखंड आज गरीबी और बदहाली के मामले में देश में मशहूर है वही बुन्देलखंड देश के सबसे समृद्ध क्षेत्र के रूप में जाना जायेगा. क्योंकि बुन्देलखंड में संसाधनों की कमी नहीं बल्कि सुशासन और अच्छी नीतियों की कमी है या यूं कहें की दो विशालकाय राज्यों केबीच घिरे होने से ऐसी भौगोलिक संरचना बन जाती है कि दोनों में से कोई भी सरकार चाहकर भी विकास नहीं करवा पाती है .बुन्देलखंड क्षेत्र में बालू ,संगमरमर से लेकर सोना,यूरेनियम और हीरा तक के भण्डार हैं. मानव संसाधन तथा पशु संसाधन ,कृषि संसाधन तथा वन संसाधन यहाँ पर्याप्त है ,सात सात नदियाँ भी बुन्देलखंड क्षेत्र से होकर गुजरती हैं जरूरत है तो सिर्फ उचित जल संचय प्रणाली की और बहुद्देशीय नदी जल परियोजनाओ के गठन की जो कि अलग राज्य बनने पर ही संभव हैं.
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संजय पाण्डेय
मंगलवार, 30 दिसंबर 2008
बुंदेलखंड,विदर्भ और तेलंगाना का गठन जरूरी : संजय पाण्डेय
नई दिल्ली।जनसंख्या एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत के प्रदेशों के आकारों में बड़ी विषमता है। एक तरफ़ बीस करोड़ से भी अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश जैसे भारी भरकम राज्य तो वहीं सिक्किम जैसे छोटे प्रदेश जिसकी जनसंख्या मात्र छः लाख है। इसी तरह एक ओर राजस्थान जैसा लंबा चौडा राज्य जिसका क्षेत्रफल साढे तीन लाख वर्ग किमी है वहीं लक्षद्वीप मात्र 32 वर्ग किमी ही है । किंतु तथ्य बताते है कि छोटे प्रदेशों में विकास की दर कई गुना अधिक है।उदाहरण के लिए बिहार की प्रति व्यक्ति आय आज मात्र 3835 रु है जबकि हिमाचल जैसे छोटे राज्य में यही 18750 रु है । छोटी इकाइयों में कार्य क्षमता अधिक होती है । सिर्फ आर्थिक मामले में ही नहीं बल्कि शिक्षा,स्वास्थ्य जैसे विभिन्न मामलो में भी छोटे प्रदेश आगे हैं। जैसे कि शिक्षा के क्षेत्र में यूपी का देश में 31 वां स्थान है (साक्षरता दर -57%) जबकि इसी से अलग होकर नवगठित हुआ उत्तराँचल प्रान्त शिक्षा के हिसाब से भारत में 14 वां स्थान रखता है (साक्षरता दर -72 %)।बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय के अनुसार यदि भारत को वर्ष 2020 तक विकसित देश बनाना है तो भारत के राज्यों का एक बार पुनर्गठन जरूरी है । पाण्डेय ने कहा कि जब तक भारत में बुन्देलखंड और विदर्भ जैसे अति पिछडे क्षेत्र बदहाल हैं (जहाँ विकास तो दूर लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं) तब तक विकसित भारत की परिकल्पना भी बेमानी होगी। क्योंकि जिस तरह शरीर को तभी स्वस्थ कहा जा सकता है जब शरीर के सभी अंग स्वस्थ हों , ठीक उसी तरह भारत को तभी विकसित कहा जायेगा जब इसकी सीमा के भीतर आने वाले सभी भाग समृद्ध होंगे । संजय पाण्डेय के अनुसार बुन्देलखंड जैसे पिछडे क्षेत्रों को नया राज्य बनाकर विकास के नए आयाम स्थापित किये जा सकते हैं. दरअसल अलग राज्य बनने पर केन्द्रित विकास के चलते द्रुत गति से समृद्धि लाई जा सकती है । अपार संसाधनों से भरपूर बुन्देलखंड क्षेत्र में अगर कमी है तो सुशासन की, जो कि अलग प्रान्त बनने कि स्थिति में ही संभव है । उन्होंने कहा कि राज्य बनने से पहले लोग हरियाणा को घास फूस का क्षेत्र कहा करते थे, किन्तु अलग राज्य बनने के बाद आज हरियाणा का विकास समूचे देश के सामने है । आज हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 16200 रु है। पाण्डेय ने कहा कि भारत के बड़े राज्यों को पुनर्गठित करके छोटे राज्यों का गठन बहुत जरूरी हो गया है। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका पचास छोटे राज्यों का संघ है इसलिए उसकी सम्पन्नता आज जगजाहिर है। हमारे देश में कुछ लोग छोटे राज्यों का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उनका मानना होता है कि इससे देश टुकडों में बटता है,किन्तु उनकी यह धारणा विल्कुल गलत है । आज़ादी के समय भारत में 14 प्रदेश थे आज 35 हैं तो क्या इतने सारे नए प्रदेशों के बनने से देश खंडित हुआ?नहीं । तब भी भारत अखंड था ,आज भी अखंड है और कुछ नए राज्य बने तो भी भारत अखंड ही रहेगा।
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