चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 8 मई 2009

मेरठ नहीं,बुन्देलखंड है प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र

इतिहास की इबारत गवाही देती है कि हिंदुस्तान की आजादी के प्रथम संग्राम की ज्वाला मेरठ की छावनी में भड़की थी। किन्तु इन ऐतिहासिक तथ्यों के पीछे एक सचाई गुम है, वह यह कि आजादी की लड़ाई शुरू करने वाले मेरठ के संग्राम से भी 15 साल पहले बुन्देलखंड की धर्मनगरी चित्रकूट में एक क्रांति का सूत्रपात हुआ था। पवित्र मंदाकिनी के किनारे गोकशी के खिलाफ एकजुट हुई हिंदू-मुस्लिम बिरादरी ने मऊ तहसील में अदालत लगाकर पांच फिरंगी अफसरों को फांसी पर लटका दिया। इसके बाद जब-जब अंग्रेजों या फिर उनके किसी पिछलग्गू ने बुंदेलों की शान में गुस्ताखी का प्रयास किया तो उसका सिर कलम कर दिया गया। इस क्रांति के नायक थे आजादी के प्रथम संग्राम की ज्वाला मेरठ के सीधे-साधे हरबोले। संघर्ष की दास्तां को आगे बढ़ाने में बुर्कानशीं महिलाओं की ‘घाघरा पलटन’ की भी अहम हिस्सेदारी थी।आजादी के संघर्ष की पहली मशाल सुलगाने वाले बुन्देलखंड के रणबांकुरे इतिहास के पन्नों में जगह नहीं पा सके, लेकिन उनकी शूरवीरता की तस्दीक फिरंगी अफसर खुद कर गये हैं। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा लिखे बांदा गजट में एक ऐसी कहानी दफन है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। गजेटियर के पन्ने पलटने पर मालूम हुआ कि वर्ष 1857 में मेरठ की छावनी में फिरंगियों की फौज के सिपाही मंगल पाण्डेय के विद्रोह से भी 15 साल पहले चित्रकूट में क्रांति की चिंगारी भड़क चुकी थी। दरअसल अतीत के उस दौर में धर्मनगरी की पवित्र मंदाकिनी नदी के किनारे अंग्रेज अफसर गायों का वध कराते थे। गौमांस को बिहार और बंगाल में भेजकर वहां से एवज में रसद और हथियार मंगाये जाते थे। आस्था की प्रतीक मंदाकिनी किनारे एक दूसरी आस्था यानी गोवंश की हत्या से स्थानीय जनता विचलित थी, लेकिन फिरंगियों के खौफ के कारण जुबान बंद थी।कुछ लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए मराठा शासकों और मंदाकिनी पार के ‘नया गांव’ के चौबे राजाओं से फरियाद लगायी, लेकिन दोनों शासकों ने अंग्रेजों की मुखालफत करने से इंकार कर दिया। गुहार बेकार गयी, नतीजे में सीने के अंदर प्रतिशोध की ज्वाला धधकती रही। इसी दौरान गांव-गांव घूमने वाले हरबोलों ने गौकशी के खिलाफ लोगों को जागृत करते हुए एकजुट करना शुरू किया। फिर वर्ष 1842 के जून महीने की छठी तारीख को वह हुआ, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। हजारों की संख्या में निहत्थे मजदूरों, नौजवानों और बुर्कानशीं महिलाओं ने मऊ तहसील को घेरकर फिरंगियों के सामने बगावत के नारे बुलंद किये। खास बात यह थी कि गौकशी के खिलाफ इस आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम बिरादरी की बराबर की भागीदारी थी। तहसील में गोरों के खिलाफ आवाज बुलंद हुई तो बुंदेलों की भुजाएं फड़कने लगीं।देखते-देखते अंग्रेज अफसर बंधक थे, इसके बाद पेड़ के नीचे ‘जनता की अदालत’ लगी और बाकायदा मुकदमा चलाकर पांच अंग्रेज अफसरों को फांसी पर लटका दिया गया। जनक्रांति की यह ज्वाला मऊ में दफन होने के बजाय राजापुर बाजार पहुंची और अंग्रेज अफसर खदेड़ दिये गये। वक्त की नजाकत देखते हुए मर्का और समगरा के जमींदार भी आंदोलन में कूद पड़े। दो दिन बाद 8 जून को बबेरू बाजार सुलगा तो वहां के थानेदार और तहसीलदार को जान बचाकर भागना पड़ा। जौहरपुर, पैलानी, बीसलपुर, सेमरी से अंग्रेजों को खदेड़ने के साथ ही तिंदवारी तहसील के दफ्तर में क्रांतिकारियों ने सरकारी रिकार्डो को जलाकर तीन हजार रुपये भी लूट लिये। आजादी की ज्वाला भड़कने पर गोरी हुकूमत ने अपने पिट्ठू शासकों को हुक्म जारी करते हुए क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए कहा। इस फरमान पर पन्ना नरेश ने एक हजार सिपाही, एक तोप, चार हाथी और पचास बैल भेजे, छतरपुर की रानी व गौरिहार के राजा के साथ ही अजयगढ़ के राजा की फौज भी चित्रकूट के लिए कूच कर चुकी थी। दूसरी ओर बांदा छावनी में दुबके फिरंगी अफसरों ने बांदा नवाब से जान की गुहार लगाते हुए बीवी-बच्चों के साथ पहुंच गये। इधर विद्रोह को दबाने के लिए बांदा-चित्रकूट पहुंची भारतीय राजाओं की फौज के तमाम सिपाही भी आंदोलनकारियों के साथ कदमताल करने लगे। नतीजे में उत्साही क्रांतिकारियों ने 15 जून को बांदा छावनी के प्रभारी मि. काकरेल को पकड़ने के बाद गर्दन को धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद आवाम के अंदर से अंग्रेजों का खौफ खत्म करने के लिए कटे सिर को लेकर बांदा की गलियों में घूमे।काकरेल की हत्या के दो दिन बाद राजापुर, मऊ, बांदा, दरसेंड़ा, तरौहां, बदौसा, बबेरू, पैलानी, सिमौनी, सिहुंडा के बुंदेलों ने युद्ध परिषद का गठन करते हुए बुंदेलखंड को आजाद घोषित कर दिया। बांदा छावनी के अफसर और सिपहसलार-फरमाबरदार बांदा नवाब की पनाह में थे, लिहाजा अंग्रेजों ने मान लिया कि पैर उखड़ चुके हैं। गजेटियर के मुताबिक अंग्रेजों ने एक बारगी जोर लगाया था, लेकिन बिठूर के पेशवा की अगुवाई में मो। सरदार खां, नाजिम, मीर इंशा अल्ला खान की नाकेबंदी के चलते अंग्रेजों की रणनीति धराशायी हो गयी। इस युद्ध में कर्वी के मराठा सरदार के भाई ने मंदाकिनी और यमुना नदी पर अंग्रेजों की सहायता के लिए आने वाली सेना को रोके रखा। इस आंदोलन को धार देने वालों में अगर शीला देवी की घाघरा पलटन का जिक्र नहीं होगा तो बात अधूरी रहेगी। अनपढ़ शीलादेवी ने इस जंग में अहम हिस्सेदारी के लिए महिलाओं को एकजुट किया और फिर पनघटों पर जाकर अन्य महिलाओं को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा करना शुरू किया। खास बात यह थी कि घाघरा पलटन में शामिल ज्यादातर महिलाएं बुर्कानशी और अनपढ़ थी, लेकिन क्रांति की इबारत में उनकी हिस्सेदारी मर्दो से कम नहीं रही।“बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी” के संयोजक संजय पाण्डेय कहते है कि जब इस क्रांति के बारे में स्वयं अंग्रेज अफसर लिख कर गए हैं तो भारतीय इतिहासकारों ने इन तथ्यों को इतिहास के पन्नों में स्थान क्यों नहीं दिया?सच पूछा जाये तो यह एक वास्तविक जनांदोलन था क्योकि इसमें कोई नेता नहीं था बल्कि आन्दोलनकारी आम जनता ही थी इसलिए इतिहास में स्थान न पाना बुंदेलों के संघर्ष को नजर अंदाज करने के बराबर है.कहा कि बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी प्रचार प्रसार के माध्यम से बुंदेलों की यह वीरता पूर्ण कहानी सारी दुनिया तक पहुचायेगी

गुरुवार, 7 मई 2009

पृथक बुन्देलखंड हेतु अब होगी निर्णायक लडाई

पृथक बुन्देलखंड राज्य की मांग में बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी द्वारा पिछले वर्षों में किए गए संघर्ष का परिणाम यह है कि एक वर्ष से राष्ट्रीय नेताओं की जुबान पर बुन्देलखंड का मुद्दा आने लगा है । एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय के अनुसार यह इस मुद्दे का सेमी फाईनल कहा जा सकता है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे का आना अपने आप में एक सफलता है। किंतु बड़े दलों द्वारा लोक सभा चुनाव में नज़रअंदाज कर देना निश्चित रूप से हमारी असफलता है ,अभी हम इसके लिए उन्हें मजबूर नही कर सके। किंतु अब बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी इस हेतु निर्णायक लडाई लड़ने कि तैयारी में है । हम बहुत जल्द ऐसी स्तिथि पैदा कर देंगे कि केन्द्र और राज्य सरकारों को विवश होकर पृथक बुन्देलखंड राज्य के मामले में संवैधानिक कार्यवाही करनी पड़ेगी।

लफ्फाजी का शिकार हुआ पृथक बुन्देलखंड राज्य का मुद्दा


बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय के अनुसार बुन्देलखंड राज्य निर्माण का मुद्दा राष्ट्रीय नेताओं की लफ्फाजी का शिकार हुआ है। कहा कि बीते वर्ष इस मुद्दे को लेकर जिन नेताओं ने बयानबाजियां की वही नेता एन वक्त पर इस मुद्दे को नज़र अंदाज कर गए । दर असल पिछले साल की शुरुआत में ही मायावती और राहुल गाँधी ने बुन्देलखंड में हुई अपनी अपनी सभाओं में कहा था कि वे पृथक बुन्देलखंड के हिमायती हैं पर लोक सभा चुनाव में न तो कांग्रेस ने और न ही बसपा ने इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्र में स्थान दिया । हालाँकि बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों ने इस मुद्दे को चुनावी रूप देने की कोशिश की।

गुरुवार, 12 मार्च 2009

लोकसभा प्रत्याशियों की सूची शीघ्र जारी करेगी बुएपा

दिल्ली। बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी बुन्देलखंड की सभी सीटो के साथ साथ दिल्ली की कुछ सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने जा रही है,सभी प्रत्याशियों की सूची शीघ्र जारी कर दी जायेगी.पार्टी संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि उनके सभी प्रत्याशी पूरे दम ख़म के साथ पृथक बुंदेलखंड राज्य निर्माण का मुद्दा लेकर चुनाव मैदान में उतरने की पूरी तयारी में हैं. कहा कि आगामी २१ मार्च को हमीरपुर में होने जा रही विशाल रैली में ज्यादातर उम्मीदवारो की घोषणा कर दी जायेगी ।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

लम्बी कवायद के फलस्वरूप राज्य निर्माण का कार्य सिफर

बुन्देलखंड राज्य निर्माण के प्रति दोहरा नजरिया रखने वाले दलों को महंगा साबित होगा।जहां बसपा प्रमुख पृथक बुंदेलखंड राज्य की वकालत करती है वही वे इस आशय का प्रस्ताव केंद्र को भेजने से कतराती है . इसका मतलब उनकी सोच में कोई खोट है. इसी तरह कांग्रेस भी बुन्देलखंड की बात करती हैं पर दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती.वर्षो से हो रही कवायद के फलस्वरूप राज्य निर्माण का कार्य सिफर बना हुआ है। कभी केन्द्र सरकार प्रात निर्माण की गेंद राज्य सरकार के पाले में डाल देती है तो कभी राज्य सरकार इसे किक कर पुन: केन्द्र सरकार के पाले में पहुंचा देती है। ये राजनैतिक दल बुंदेलखण्ड में फैले भ्रष्टाचार, अकाल की स्थिति पर आसू तो बहाते है, लेकिन इन समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए प्रात का निर्माण करने में पीछे हट जाते है। यही बड़ी वजह है कि बुन्देलखण्ड बड़ी कीमत चुकाने के पश्चात भी प्रात के रूप में पहचान हासिल नहीं कर पा रहा है।बुन्देलखण्ड का मसौदा वर्ष 1955 में ही तय कर लिया गया था, लेकिन तत्समय इसको अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, जिसका खामियाजा आज तक बुन्देलखंडियों को भुगतना पड़ रहा है। कई संगठन प्रात निर्माण के मुद्दे को जीवित बनाये हुए है। प्रात निर्माण के लिए बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी ने उग्र आदोलनों की शुरुआत की है ,इन आदोलनों के पश्चात तेजी से सरकारों का ध्यान बुन्देलखण्ड की बदहाली पर गया . वर्तमान समय में बुन्देलखण्ड में अनेक कार्यक्रम प्रात निर्माण की लड़ाई के लिए चलाये जा रहे है। रैलियों, आदोलनों के फलस्वरूप भी प्रात अब भी देश के नक्शे पर उभर नहीं पाया है। बुन्देलखण्ड में इतना राजस्व प्राप्त होता है जो एक प्रात के लिए जरूरी है। इसके बावजूद भी सरकारे इसे प्रात का नाम देने में सकुचा रही है। बुद्धिजीवी लोगों का मानना है कि सरकारों द्वारा बुन्देलखण्ड को प्रात नहीं बनाने के पीछे बड़े राजनैतिक दल ही है . सपा जैसे भी कई दल है जो अलग प्रात बनाने पर सीधे तौर पर न कर चुके है। उन्हे लग रहा है यदि बुन्देलखण्ड राज्य बन गया तो उनका बड़ा वोट बैंक खिसक जायेगा। बुद्धिजीवी मानते है कि भले ही बुन्देलखण्ड में अशिक्षितों की बड़ी तादाद हो लेकिन समय आने पर इस क्षेत्र के लोग ऐसे राजनैतिक दलों को सबक सिखा देंगे।आगामी लोकसभा चुनाव में यहाँ की जनता इनसे खुलकर बदला लेने के मूड में है

रविवार, 18 जनवरी 2009

बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी बनाएगी एक लाख नए सदस्य

बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि पार्टी का लक्ष्य है कि लोक सभा चुनाव से पूर्व पूरे बुंदेलखंड मे सदस्य संख्या कम से कम एक लाख हो जाये. हालाँकि देखने मे यह अत्यंत कठिन काम प्रतीत होता है परन्तु पार्टी संगठन के पदाधिकारी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दिन रात लगे हुए हैं, बांदा मे सुरेन्द्र तिवारी, झाँसी मे कुवर बहादुर आदिम, छतरपुर मे राजा प्रजापति, चित्रकूट मे लवलीन द्विवेदी ने इस अभियान कि शुरुआत कर दी है.

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी की “कारण बताओ रैली"

बांदा। बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी पृथक बुन्देलखंड राज्य का मुद्दा लेकर चुनाव लड़ने की तयारी में जुट चुकी है। चुनाव से पूर्व बुंदेलखंड क्षेत्र के हर मतदाता तक पृथक प्रान्त के औचित्य को पहुचाने के लिए पार्टी ने विभिन्न कार्यक्रम आरम्भ किए हैं। ब्लाक (प्रखंड) स्तर पर टोलियाँ गठित की जा रही हैं जो सम्बंधित प्रखंड के अन्दर आने वाले सभी गावों में बारी-बारी से पहुंचकर वहां संकल्प सभाएं आयोजित करके लोगो को शपथ गृहण करवाई जायेगी तथा पृथक राज्य आन्दोलन में सर्वस्व समर्पण के संकल्प को दोहराया जाएगा। उक्त जानकारी पार्टी संयोजक संजय पाण्डेय ने यहाँ एक प्रेसवार्ता में दी। पाण्डेय ने पत्रकारों को जानकारी देते हुए बताया कि फरबरी में बांदा में "कारण बताओ रैली " का आयोजन किया जाएगा जिसमे बुंदेलखंड के विभिन्न जिलों से आए हजारों आन्दोलनकारी केन्द्र और राज्य सरकारों को घेरते हुए सबाल पूछेंगे कि आख़िर बुन्देलखंड राज्य मसले पर सार्थक कार्यवाही क्यों नही? कारण पूछा जाएगा कि जब मायावती बुन्देलखंड राज्य की पक्षधर है तो वे केन्द्र को प्रस्ताव क्यों नही भेजती? कारण पूछा जाएगा कि जब मनमोहन सिंह समेत पूरी कांग्रेस और यूपीए सरकार बुंदेलखंड राज्य की वकालत करते हैं तो राज्य पुनर्गठन आयोग क्यों नही बनता? कारण पूछा जाएगा कि कांग्रेस और बसपा के सांसद संसद में इस मुद्दे को क्यों नही उठाते?कांग्रेस और बसपा के नेताओं से पूछा जाएगा कि वे बुंदेलखंड राज्य मामले पर फर्जी बयानबाजी कर पॉँच करोड़ बुन्देलखंडी लोगो का भावनात्मक शोषण करने से बाज क्यों नही आते? कारण पूछा जाएगा कि कांग्रेस और बसपा इस मुद्दे के पक्ष में है तो वे बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल क्यों नही करती?कुल मिलाकर बुंदेलखंड एकीकृत पार्टीफर्जी शिगूफे छोड़ने वालों को बेनकाब करेगी। बांदा के बाद झाँसी और खजुराहो में भी ऐसी रैलियां होगी.
 
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